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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

तब भाजपा का जन्म भी नहीं हुआ था .

गुजरात में दुग्ध क्रन्ति १९७३ में वी जे कुरियन की अगुवाई में शुरू हुई . तब तक भाजपा का जन्म भी नहीं हुआ था .
गुजराती व्यापारी कई सौ सालों से देश विदेश में व्यापार करते हैं . यह कोई मोदी की दें नही है.

गुजराती किसान पहले भी देश के अन्य किसानों के मुकाबले उन्नत ही थे .

तब मोदी नाम के किसी व्यक्ति को कोई नहीं जानता था .

मोदी का नाम तो गुजरात में मुसलमानों के बड़े जनसंहार के बाद मशहूर हुआ .

अपने ऊपर लगे खून के दाग धोने के लिये मोदी ने पहले से ही विकसित गुजराती किसानों और गुजराती विकास को अपनी कारगुजारी बताना शुरू कर दिया .

यह एक चालाक हरकत है .

गुजरात में वन वन अधिकार क़ानून के बाद आदिवासियों को उन ज़मीनों के पट्टे मिलने चाहिये थे जिन पर वह पहले से खेती कर रहे थे .

लेकिन मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों के आवेदनों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया .

इना ही नहीं उल्टा मोदी ने गुंडा गर्दी कर के आदिवासी किसानों की ज़मीनों को छीनना भी शुरू कर दिया . किसानो की पिटाई करवानी शुरू कर दी गई .

कई अधिकारियों ने बताया कि मोदी ने दो लाख एकड़ ज़मीने बड़े कारखानेदारों को दे दी हैं .

सानंद विश्वविद्यालय को बंद कर के विश्वविद्यलय की ज़मीन टाटा को नैनो कार बनाने के लिये दे दी गई है .
बडौदा अहमदाबाद हाई वे के दोनों तरफ छह किलोमीटर की ज़मीने मोदी ने उद्योगों के लिये रिजर्व कर दी हैं .
गुजरात आज कल बड़े लोगो का पैसे वालो का स्वर्ग बना हुआ है .
न्हें सारे टैक्सों में छूट है . वे जैसा चाहे प्रदूषण फैला सकते हैं . जितना चाहे नदियों को गन्दा कर सकते हैं . जितना चाहे हवा में प्रदूषण फैला सकते हैं .
उनके खिलाफ आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं के घर पर पुलिस पहुँच जाती है .
गुजरात में मज़दूर अपनी बुरी हालत के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते .

तो अगर आप पैसे वाले हैं तो गुजरात में आइये . मुफ्त की ज़मीन लीजिए .टैक्स मत दीजिए . प्रदुषण फैलाइए . मजदूरों को सताइए . मोदी का गुणगान कर दीजिए और उन्हें खुश कर दीजिए .

अब ये मोदी माडल भाजपा देश में बेचने निकली है .

अगर इस देश के युवा को यही माडल चाहिये जिसमे सारी ज़मीने उद्योगपतियों की हो जाएँ .

जहां सरकार को कल्याणकारी कार्यक्रम के लिये कोई टैक्स भी ना मिले .

जहां ये उद्योगपति हमारी हवा और पानी को गन्दा कर दें .

करोड़ों किसन बेज़मीन होकर शहरों के बाहर गंदी बस्तियों में कीड़े मकोडों की तरह रहने और बेरोजगारी, भूख और बीमारी से मरने को मजबूर हो जायें .

कुछ लोगों के मज़े के लिये पूरे देश को मरने के लिये मजबूर कर देने वाला यह विकास . यह घोर असमानता पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था . इस विनाश को अंजाम देने वाली राजनीति हम सबको स्वीकार नही है .

इस सब को स्वीकार करने का अर्थ भगत सिंह, गांधी, मार्क्स, वेद कुरान बाइबिल ग्रन्थ साहब सब को नकारना होगा . क्योंकि इन सब ने तो हमें सबकी समानता,प्रकृति के साथ साहचर्य और मिल कर रहना सिखाया था.

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

आखिर संजीव भट्ट क्या है ?

मित्रों कांग्रेस और विदेशी ताकतों के फेके टुकड़े पर पलने वाली मिडिया आखिर संजीव भट्ट के बारे मे इस देश के सामने सिर्फ आधी सच्चाई ही क्यों दिखा रही है ?
असल मे संजीव भट्ट एक “विसिल ब्लोव्वर ” नहीं बल्कि कांग्रेस के हाथो खेलने वाले एक “खिलौना ” भर है .. जैसे कोई बच्चा किसी खिलौने से सिर्फ कुछ दिन खेलकर उसे कूड़ेदान मे फेक देता है ठीक वही हाल कांग्रेस संजीव भट्ट का भी करने वाली है .. एक बार अमर सिंह से पूछ लो कांग्रेस क्या है ?
लेकिन मीडिया जिस तरह से संजीव भट्ट को एक “नायक ” दिखा रही है वो एक झूठ है .
१- जब ये जनाब १९९६ मे बनासकाठा के एसपी थे तब इन्होने सिपाही पद की भर्ती मे बड़ा घोटाला किया था . इनके खिलाफ बड़े गंभीर आरोप लगे ..इन्होने भर्ती की पूरी प्रक्रिया को नकार दिया था और ना ही उमीदवारों के रिकार्ड रखे थे .

भारत माँ की आरती

बिखरी ताकत जुटा देश की, फिर संवार दे छटा देश की।
भारत माता हमको आज पुकारती, चलो उतारे आरती॥

आज अनेकों प्रान्त जल रहे, अपराधी दुर्दान्त पल रहे।
घोर अराजकता हमको ललकारती, चलो उतारें आरती॥

चकाचौंध में भौतिकता की, काया गिर रही नैतिकता की।
प्रगतिशीलता संस्कृति को ललकारती, चलो उतारें आरती॥

केशव ने जो मार्ग दिखाया, मधुकर ने चलकर बतलाया।
मातृभूमि उस पथ पर बाट निहारती, चलो उतारें आरती॥

सब आपस के भेद भुला दें, हृदय हृदय के तार मिला दें।
विश्व मंच पर शोभित हो माँ भारती, चलो उतारें आरती॥

अच्छे मकसद के साथ एकतरफा और अतार्किक....

जन लोकपाल बिल को लेकर जारी सिविल सोसाइटी की लड़ाई अपने अच्छे मकसद के साथ-साथ अन्ना हजारे के एकतरफा और अतार्किक फैसलों के लिए भी चर्चा में रही है। लेकिन इधर कुछ घटनाएं ऐसी हुई हैं जिनसे टीम अन्ना की सीमाएं कुछ ज्यादा ही उजागर हो गई हैं। टीम अन्ना यानी आंदोलन की 22 सदस्यीय कोर कमेटी के दो सदस्यों, गांधीवादी संगठक वी. पी. राजगोपाल और पर्यावरण कार्यकर्ता राजेंद सिंह के इस्तीफे से इसमें सतह के नीचे मौजूद गहरी बेचैनी का अंदाजा मिलता है।

रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन के वक्त टीम से स्वामी अग्निवेश की दूरी भी इसके फैसलों के अलोकतांत्रिक स्वरूप को लेकर ही बननी शुरू हुई थी, जिसका अंत एक साजिशाना स्टिंग ऑपरेशन में हुआ। जस्टिस संतोष हेगड़े और मेधा पाटेकर की कांग्रेस समर्थक छवि कभी नहीं रही, लेकिन टीम अन्ना के कांग्रेस हराओ अभियान पर वे भी खुलकर अपनी नाखुशी जाहिर कर चुके हैं।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

ये कैसा वक्त है ?

ये कैसा वक्त है ?
न जज्बा है,न प्यार,न अहसास दिलों में
हां,मकान आलीशान हैं,ये कैसा वक्त है ?
फरिश्ते भी हैं यहां,शैतान भी मिले
मिलता नहीं इंसान है,ये कैसा वक्त है ?
मुल्क के हैं रहनुमा,पर चेहरे हैं दागदार
                भूखा मरे किसान,ये कैसा वक्त है करोडों में बिक रहे हैं कौडियों के लोग
            न धर्म,न ईमान है,ये कैसा वक्त है ?
                                                                          ये कैसा वक्त है ?

शनिवार, 17 सितंबर 2011

हिंदी मेरी जान

हिंदी
मेरी जान है
यह हमारी
राष्ट्र भाषा
मेरे देश की शान है
... ... रहते हो कहीं भी
हमारी
यही पहचान है
है देश की
प्राणमयी भाषा
यही
हमारी आन है
अग्रसर है
विश्वभाषा बनने को
यही हमारा
मान है
वाहक ये संस्कृत की
दर्पण ये साहित्य समाज की
यही हमारा अभिमान है
तन-मन प्राणों से प्यारी
हम सबका सम्मान है
१४ सितम्बर हिंदी दिवस पर आप सभी को बधाई और शुभकामनाये
वन्देमातरम
जय हिंद जय भारत
==========================
निज भाषा का नहीं गर्व जिसे ,
क्या ? प्रेम देश से होगा उसे ,
वही वीर देश का प्यारा है,
हिन्दी ही जिसका नारा है ll "
'हिन्दी दिवस' (१४ सितम्बर) की
हार्दिक शुभकामनाये !!
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शान से बोले हिन्दी
किसी भी भाषा को सीसना कोई बुरी बात नही है लेकिन अपनी भाषा बोलने से आपका व्यक्तित्व कमतर आँका जाएगा....
हिन्दी आपकी भाषा है और इसका बेहिचक ईस्तेमाल किया जाना चाहिए । बजाऐ अधकचरी अंग्रेजी या न समझ मे आने वाली बात अग्रेजी मे कहने के अपनी भाषा मे यदि अपनी बात की जाऐ तो प्रभाव भी ज्याद पड़ेगा और सुनने वाले को समझ भी जल्दी आएगी
सौ.नवदुनिया
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कोई भी देश सच्चे
अर्थोँ मे
तब तक स्वतत्रं नहीँ है जब तक वह
अपनी भाषा मेँ नहीँ बोलता।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।
"वन्दे - मातरम"

जन गण मन की कहानी

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन कोलेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंगआन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए
  तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए केकलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली
  ले गए और 1911में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग
  विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित
  किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में
  आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के
> स्वागत में लिखना ही होगा।
>
> उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के
  बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई
  अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के
  निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा
> हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए।
> रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन
  अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी
  राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त
  में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।

  इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता
> अपने मन से आपको भारत काभाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (
> Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो !
> तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब
> महारास्त्र,द्रविड़
> मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना
> और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते
> है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे
> भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "

  जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो
  इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि
  जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये
> गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थक्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह
> बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने
> नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम
> के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए।
  जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।

  उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो
  रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि
  गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब
डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने
> एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो
  और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि
नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को
  सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबलपुरस्कार दिया गया।
  रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ
  और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी
  तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा,तुम अंग्रेजों
  के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी
  स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम
  अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद
  खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को
> लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथटैगोर ने लिखा वो
> अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के
  खिलाफ होने लगे थे।

  रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और
  ICS ऑफिसर
  थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) ।
  इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव
  डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं
> गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी
  को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी
  मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की
  मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और
  सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

  1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे
  एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे।
> मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की
> सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि
> गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को
> धोखा देना है। इस मतभेद के कारणलोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने
  गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।

  गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया
  करते थे। और नरम दल केनेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि
> गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी
> तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश
> के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे।
> उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से
  समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले
  गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम
  दल वाले "वन्दे मातरम"।

  नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो
> अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को
> वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप
  जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन
  गई थी जिसके प्रमुखमोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर
  दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से
  अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और
  मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन1947 में स्वतंत्र हो
  गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली।
> संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित
  वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।

  बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित
  जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट
> पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं
> अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे
> पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी
  नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत
  तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया
> "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा"। लेकिन नेहरु जी उसपर भी
  तैयार नहीं हुए।

  नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन
> ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को
> गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को
> राष्ट्र गान घोषित कर दिया औरजबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके
  जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है,और दूसरा पक्ष नाराज न
हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया।
  नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट
  पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान
  बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे,जन गण मन को इस लिए
  तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम
  इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्दहोता था।
>
  बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे
> , उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने
> कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे
  लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को
  इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक
  जज्बा पैदा होता है।

  तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का।

रविवार, 11 सितंबर 2011

pro. MATUKNATH NATH

”मनुष्य की यही स्वतंत्रता है कि वह जिसे चाहे उसे चुन ले” -मटुक नाथ

एक महिला ने मुझे फेसबुक के माध्यम से सलाह भेजी है और उस पर गौर करने को कहा है। उस स्त्री का नाम है प्रिया हल्दोनी, पति का नाम संदीप हल्दोनी। रहती हैं नयी दिल्ली में। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। सम्प्रति दिल्ली स्थित ‘नेशनल इन्स्टीच्यूट ऑफ पैथोलॉजी एंड बायोमेडिकल रिसर्च’ में शोध कर रही हैं। अपने बारे में इतनी जानकारी उन्होंने फेसबुक पर दी है।
मटुक नाथ- जूली: स्वच्छंद प्रेम के प्रतीक?
मैं स्त्री-पुरुष दोनों को प्यार करता हूँ। लेकिन जैविक कारणों से स्त्रियाँ हठात् आकर्षित कर लेती हैं। इसलिए उनकी उपेक्षा नहीं कर पाता हूँ। मैं प्रिया की बातों पर अवश्य गौर करूँगा- गहराई तक उतरने का प्रयास करूँगा। उनकी बातों का अर्थ क्या है, कहाँ से पैदा होती हैं ऐसी बातें, क्यों पैदा होती हैं, सही बात क्या हो सकती है, इन सब पर विचार करूँगा। पहले देख लेते हैं कि उनकी सलाह क्या है-
‘‘आपने अपनी एक्स वाइफ का साथ छोड़ा एक ऐसी उमर में जब उन्हें आपकी बहुत जरूरत थी, क्योंकि अभी तक उन्होंने ही आपका साथ दिया था, तो आपको भी उसके साथ रहना चाहिए। यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे, तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का। इसलिए इस पर गौर करें। प्यार सब कुछ नहीं होता, कुछ रिश्ते हमें समाज में रहने के लिए निभाने पड़ते हैं। आपका ये कर्म समाज को गलत मैसेज देता है। हो सके तो इसे समझने का प्रयास करें।’’
प्रिया की सबसे बड़ी चिंता है कि मैंने जो किया, उससे समाज को गलत संदेश मिल रहा है। ‘यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का।’ दरअसल यह अकेले प्रिया हल्दोनी की चिंता नहीं है, भारतवर्ष के लाखों-करोड़ों स्त्री-पुरुषों की चिंता है। इसलिए मामला गंभीरता से विचार करने योग्य है। एक बात स्पष्ट है कि मैंने जो किया है उससे समाज आंदोलित हुआ है। यह अच्छी बात है, क्योंकि आंदोलन से जड़ता टूटती है। लोग चली आ रही मान्यताओं पर नये सिरे से विचार करते हैं।
मेरे कर्म का प्रभाव एक ही जैसा हर जगह नहीं है। अलग-अलग आदमियों पर अलग-अलग प्रभाव है। व्यक्ति भेद से प्रभाव बदल जाता है। तीन-चार साल पहले की बात है। एक दिन मैंने टीवी खोला तो अचानक देखा कि कवि सम्मेलन चल रहा है और एक कवि मेरे ही ऊपर कविता पढ़ रहा है। कविता में उपमानों की झड़ी थी। मुझे सिर्फ एकाध बात ही याद है। कवि महोदय मंच पर आते हैं। कहते हैं- आपलोगों ने टीवी पर एक प्रेमी जोड़ा देखा होगा। और शुरू हो जाते हैं- ‘जैसे कौवे की चोंच में जलेबी’, इत्यादि।
पूरी कविता कवि की लोलुप दृष्टि को दर्शाती है। कवि को लगता है, हाय रे, मैं कितना हतभाग्य। जलेबी तो मेरी चोंच में होनी चाहिए, कौवे की चोंच में कैसे चली गयी ? अशोभनीय ! निंदनीय !! मनुष्य के हृदय में निवास करने वाली ईष्र्या बहुत ही दमदार भाव है; क्योंकि जरा सा अवसर मिलते ही क्षण मात्र में भड़क जाती है। अगर हम अपने नैतिक मूल्यों पर विचार करें तो पता चलेगा कि उनमें से बहुतों के केन्द्र में ईष्र्या है। जो नैतिकता ईष्र्या के पेट से पैदा होगी, वह न जाने मनुष्य को किस गड्ढे में धकेल देगी !
जुलाई, 2006 में मुझे एक पोस्टकार्ड मिला, जिसमें मेरे और जूली के प्रेम पर दो पंक्तियाँ लिखी थीं-
‘‘पहलु-ए-हूर में लंगूर, खुदा की कुदरत
कौआ के चोंच में अंगूर, खुदा की कुदरत’’
कौवा मुझे बहुत सुंदर पक्षी मालूम पड़ता है, पता नहीं क्यों कविगण कौवों पर इतने खफा रहते हैं ! लंगूर की भी अपनी खूबसूरती होती है, लेकिन केवल हूर पर ही लुब्ध रहने वाले शायर लंगूर के सौन्दर्य से वंचित हो जाते हैं। इसके लिए थोड़ा गहरा सौन्दर्य बोध चाहिए। बहरहाल, कवि ने अपना नाम ‘एक तिड़कमी शायर, फारबिसगंज’ बताकर असली नाम छिपा लिया है। भय के कारण आदमी अपना नाम छिपाता है। वह भय समाज का हो या जिसको लिखा है उसका हो, या पाप बोध का हो, भय किसी का भी हो, इतना स्पष्ट है कि ऐसा लिखते हुए कवि काँप रहा है ! क्या भयभीत व्यक्ति समाज को रास्ता दिखा सकता है ? इस पत्र में भी शायर की ईष्र्या ही मुखर है।
ईष्र्या दो प्रकार की होती है- एक , जो दूसरे को मिला है, वह उसे न मिलकर मुझे मिल जाय। दो, मुझे नहीं मिला तो किसी को न मिले। दूसरी ईष्र्या ज्यादा विनाशकारी है।
इस तरह मेरे कर्म से अनेक प्रकार के लोग अनेक तरह से आंदोलित हुए। किसी की सोयी रसिकता अचानक  जाग गयी! किसी का आया बुढ़ापा भाग गया! किसी को अपने को श्रेष्ठ साबित करने का मौका मिला ! कोई दूसरे को नीचा दिखाने में रस लेने लगा ! किसी का मन मसखरी के लिए मचल उठा ! किसी को उपदेश देने का स्वर्णिम सुयोग मिल गया ! कुछ शिक्षक मन ही मन उत्साहित हो गए ! कुछ शिक्षक स्वयं के बेनकाब होने के भय से अत्यधिक क्षुब्ध और क्रुद्ध हो गए ! कोई पत्नी अपने पति से सशंकित रहने लगी ! कोई पति पत्नी से सावधान हो गया! कहीं  पति पत्नी दोनों प्रसन्न हो गये! एक पति ने मेरे प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा- झेला आपने, फायदा हुआ मुझे। मैंने पूछा- कैसे ? बोले- अब पत्नी पहले से ज्यादा प्रेम देने लगी है ! इस तरह अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएँ हुईं।  प्रतिक्रियाओं के असंख्य रूपों में एक खास रूप श्रीमती प्रिया हल्दोनी का है। यहाँ वही विचारणीय विषय है।
प्रिया हल्दोनी: सवाल तो उठेंगे ही
प्रिया जी समाज पर मेरे गलत प्रभाव पड़ने की आशंका से परेशान हैं। प्रभाव एक प्राकृतिक क्रिया व्यापार है। हर आदमी दूसरे को प्रभावित कर रहा है और स्वयं उससे प्रभावित हो रहा है। इससे तो बचा नहीं जा सकता। प्रिया भी मुझसे प्रभावित हैं और मैं भी उनसे प्रभावित हूँ। यह प्रभावित होने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह कौन सा प्रभाव लेता है और कौन सा छोड़ देता है। गलत या मूर्छित आदमी अच्छे कर्म से भी गलत प्रभाव ले लेता है और अच्छा एवं सजग आदमी गलत काम से भी कुछ अच्छा निकाल लेता है। इसलिए प्रभावित करने वाले को न पकड़कर प्रभावित होने वाले आदमी को पकड़ना चाहिए। वर्षा की बूँदें समुद्र में गिरती हैं तो समुद्र हो जाती हैं, गंगा में गंगा और नाले में नाले का गंदा पानी ! एक दिन मैंने गंदे नाले के पानी को शोर मचाते सुना- ‘वर्षा बंद करो, वर्षा बंद करो। उसके जल ने मुझे गंदा कर दिया है !’ लोग नाले के इस शोर शराबे पर हँसकर कहने लगे- अरे गंदा पानी, वर्षा की बूँदें गंदी नहीं हैं, तुम गंदे हो। तुम्हीं ने अपनी गंदगी मिलाकर उस स्वच्छ जल को गंदा कर दिया है। मेरा भी मन कहता है कि प्रियाजी से पूछूँ- क्या आपने भी प्रेम की निर्मल बूँदों को गंदा नहीं कर दिया है ? प्रिया लिखती हैं- ‘‘प्यार सब कुछ नहीं होता, कुछ रिश्ते हमें समाज में रहने के लिए निभाने पड़ते हैं।’’
अगर आपने प्यार को गंदा न किया होता तो ऐसा कभी नहीं कहतीं। प्यार की पावनता का आपको पता होता तो आप कहतीं- ‘प्यार ही सबकुछ होता है और इसी से समाज के सारे रिश्ते ढंग से निभते हैं।’ पति अथवा पत्नी तिजोरी में बंद कर रखने वाली वस्तु नहीं होते प्रियाजी। जिस कुएँ का पानी नहीं निकाला जाता है, वह सड़ जाता है। तालाब का पानी गंदा हो जाता है, लेकिन बहता पानी निर्मला। पति पत्नी के संबंध पर पहरेदारी मत कीजिए। ईष्र्या और एकाधिकार से संबंध जहरीला हो जाता है। पति को अगर गुलाम बनाइयेगा तो प्रेम खो जायेगा, पत्नी पर कोई सवार रहेगा तो प्रेम मिट जायेगा। हमारे समाज में तो प्रेम की भू्रण हत्या होती है, पैदा होने से पहले ही उसे मार दिया जाता है। मरा हुआ प्रेम ढोने को ही आप निभाना कहती हैं- जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को ढोती रहती है ! बहुत मुश्किल है ईष्र्या और अधिकार भावना से बाहर होना। यह तपश्चर्या है। इस तपस्या के बिना समाज प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता।
मटुक का मतलब है घोर अभाव और कठिनाइयों में भी आनंदित रहने की क्षमता ! मटुक का मतलब है प्रेम के लिए संसार की सारी प्रेम विरोधी शक्तियों से एक साथ टकराने का अदम्य साहस। उनसे लड़ते लड़ते वीरगति पाने की उत्कट लालसा। मटुक का मतलब है अंदर और बाहर की एकता। मटुक का मतलब है सबके प्रति सद्भाव। मटुक का मतलब एक ऐसे समाज का निर्माण है जिसके केन्द्र में प्रेम हो। जहाँ प्रेम होगा, वहाँ शोषण नहीं हो सकता। जहाँ शोषण नहीं होगा वहाँ धन इकट्ठा करने वाला कुबेर न होगा। जहाँ कुबेर न होगा, वहाँ कोई चोर भी न होगा, न भ्रष्टाचार होगा। मटुक का मतलब है एक ऐसी विचारधारा जिसमें अपनत्व हो, मैत्री हो, प्रेम हो, कोई किसी का मालिक न हो। व्यक्ति स्वयं अपना मालिक हो। मटुक का मतलब है स्त्री पुरुष के सहज नैसर्गिक प्रेम की स्वीकृति और उसके फलने फूलने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता। गलत संदेश मेरी तरफ से नहीं जा रहा है। समाज पहले से ही गलत संदेश से ग्रसित है, क्योंकि प्यार से उसे डर लगता है और उससे परहेज करता है। मैं तो तपस्यारत हूँ। मुझसे अगर कोई संदेश निकलेगा तो तप का ही निकलेगा। लेकिन आप तप करने को राजी नहीं हैं। आप पति या पत्नी पर मिलकियत छोड़ने को तैयार नहीं हैं। संदेश न लेना आपकी स्वतंत्रता है। जैसे जीना चाहते हैं, वैसे जीयें। लेकिन गलत जीवन जीने वाला दुख पाता है और अपने दुख की जिम्मेदारी दूसरों को देकर उन्हें भी परेशान करना चाहता है। उन्हें तरह तरह से सलाह देता है और कभी दुश्मन मानकर आक्रमण कर बैठता है।
प्रियाजी लिखती हैं- ‘‘ आपने अपनी एक्स वाइफ का साथ छोड़ा एक ऐसी उमर में जब उन्हें आपकी बहुत जरूरत थी, क्योंकि अभी तक उन्होंने ही आपका साथ दिया था तो आपको भी उनके साथ रहना चाहिए।’’
क्या आप मेरी पत्नी से मिलीं ? मुझसे मिलीं ? मेरे जीवन और पत्नी के जीवन को अंदर बाहर से जाना ? हम दोनों के संबंधों को निकट से देखा, समझा ? जाहिर है, आपने ये सब नहीं किया। फिर भी कितने आत्मविश्वास के साथ आप उपर्युक्त वचन कह गयीं ! अंग्रेजी में एक कहावत है- ‘फरिश्ते जहाँ पाँव रखने में घबड़ाते हैं, मूर्ख वहाँ सरपट दौड़ लगाते हैं !’ आप सरपट दौड़ लगा गयीं ! पता लगाने का विषय है कि मैंने पत्नी को छोड़ा या पत्नी ने मुझे छोड़ा ! पत्नी को मेरी जरूरत थी या किसी और चीज की जरूरत थी ! पत्नी को मैंने सताया या पत्नी ने मुझे ! मेरी संपत्ति पत्नी ने हड़पी या मैंने उसे उससे वंचित किया ! सचाई का पता वह लगाता है जो खोजी वृत्ति का होता है, जिज्ञासु होता है। हमारी शिक्षा ने जिज्ञासा को नष्ट कर दिया है। उसने किसी चीज पर संदेह कर श्रमपूर्वक उसे दूर करने की विद्या नहीं सिखायी- उसने अंधविश्वास सिखा दिया ! इसी खोजी वृत्ति के अभाव में हमारे देश में विज्ञान नहीं पनपा। कहने के लिए तो आप एक रिसर्चर हैं, लेकिन अनुसंधान की वृत्ति आप में होती तो आप बिना पता लगाये वह नहीं लिख जातीं, जो लिख गयीं !
आप तो जिस भाषा का प्रयोग कर रही हैं उसका भी अर्थ नहीं समझ रही हैं, तो दूर स्थित मटुक का अर्थ कहाँ से समझेंगी ? एक्स वाइफ का माने होता है वह स्त्री जो अब वाइफ नहीं हैं, पहले कभी थी। जो छोड़ी जा चुकी है, जो अतीत हो चुकी है। एक्स वाइफ ( छोड़ी हुए वाइफ ) को छोड़ने का क्या अर्थ होता है ? आप कृपया जान लीजिए- मेरी पत्नी मेरे लिए सदा वर्तमान है, वह भूतपूर्व नहीं है। वह सदा सुहागन है ! न मैंने उसे तलाक दिया है और न दूसरी शादी की है। मेरे मन में उसके लिए जगह है। साथ ही यह भी कह दूँ कि मेरा प्रेम पाने के अधिकारी वे सभी व्यक्ति हैं जो ईष्र्या रहित हैं। ऐसे ही लोगों पर मैं अपने को लुटाता हूँ। आपने मेरी पत्नी को भूतपूर्व बनाने का अपराध किया है। अगर मेरी पत्नी को यह मालूम होगा, तो वह आपका मुँह नोच लेगी !
लोग सिर्फ मेरी पत्नी को ढाल बनाकर उसकी आड़ में अपनी ही व्यथा कहते हैं। आपने भी संभवतः यही किया है। पुरुष की वृत्ति स्वभावतः चलायमान होती है। आपके पति भी संभवतः अपवाद नहीं होंगे। उनकी हरकतों को देखकर भीतर से आपकी आत्मा डाँवाडोल हो गयी होगी ! घबड़ाहट में आप अपने और अपने पति के भीतर नहीं झाँककर हजार किलोमीटर की दूरी पर बैठे मटुक को दोषी ठहरा रही हैं! आपका दाम्पत्य जीवन चाहे जैसा भी हो, उसके लिए जिम्मेदार आप ही दोनों हैं। मैं कैसे हो सकता हूँ ? मान न मान मैं तेरा मेहमान ! मुझे आप मेहमान मत बनाइये। मुझे आपने दिल के किसी कोने में जगह दे दी होगी, इसी से सब उपद्रव हो रहा है। आप एकनिष्ठ होकर अपने पति में चित्त को रमाइये। जब आप पति प्रेम में रसमग्न होंगी तो मेरा प्रभाव वहाँ तक नहीं पहुँचेगा। मेरा प्रभाव उन्हीं पर पड़ता है जिन्होंने अपने दिलों में मुझे जगहें दे रखी हैं।
आप लिखती हैं-‘ यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे, तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का ?’
मुझे तो अब तक मेरे जैसा एक भी आदमी पूरे देश में नहीं दिखा, आपको कहाँ दिख गया ? जाहिर है, आपको भी नहीं दिख रहा है, आप केवल कल्पना कर रही हैं कि अगर ऐसा होगा तो क्या होगा। आपको वर्तमान की जरा भी फिक्र नहीं है, भविष्य की कल्पना से त्रस्त हैं ! यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है।  वर्तमान में स्थित होकर जीयें, कभी कोई समस्या नहीं होगी।
आश्चर्य तो मुझे इस बात से हो रहा है कि आपने प्रसंग उठाया पत्नी का और चिंता करने लगीं मां-बहनों की ! मेरी पत्नी भाग्यशालिनी माँ है। उसका बेटा बहुत योग्य, मेधावी, कलाकार और मातृभक्त है। विदेश जाना अभी तक मेरे लिए सपना बना हुआ है ! लेकिन मेरे बेटे ने अपनी माँ को दुनिया के कुछ हिस्सों की सैर करा दी है। भारत के महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों का दर्शन हवाई जहाज द्वारा करा दिया है। मेरी पत्नी हर तरह से सशक्त अपने डॉक्टर भाई की दुलारी और प्यारी बहन है। वह ऐसे सामर्थ्यवान भाई की बहन है जो अपनी बहन की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता है- यहाँ तक कि अपनी नाक भी कटा सकता है! भगवान करे आपको भी ऐसा पुत्र और भाई मिले।
आप पत्नियों की तरफदारी करने चलीं थीं, लेकिन किसी हीन ग्रंथि के कारण मां-बहन की तरफदारी करने लग गयीं ! अपने वाक्यार्थ के प्रति भी आप बेखबर हैं, तो मेरी खबर कैसे रखेंगी ? आपको लिखना चाहिए था कि यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे तो क्या होगा इस देश की पत्नियों का ? मैं कहता हूँ, कुछ नहीं होगा; क्योंकि एक तो सभी लोग ऐसा नहीं करेंगे। दूसरे, जो थोड़े से लोग करेंगे, उनकी पत्नियों को कोई चिंता करने की बात नहीं है, क्योंकि पुरुषों को दूसरों की पत्नियाँ, चाहे जैसी भी हों, सदा आकृष्ट करती हैं। स्त्री अगर स्वयं सदा के लिए किसी पुरुष की गुलाम बनी रहने पर अड़ी रहे तो कोई पुरुष उसे मुक्ति नहीं दिला पायेगा। अगर पत्नियों को अपने भीतर आकर्षण पैदा करना है तो जरा सा अपने पति को भी ढील दे दें और स्वयं भी ढील ले लें।
जड़ वैवाहिक संबंध ने मनुष्य को पशु से भी नीचे कर दिया है। विवाह के द्वारा मनुष्य चला था पशु से अच्छा बनने के लिए और उससे भी बदतर जगह पर पहुँच गया! एक जानवर भी स्वतंत्रतापूर्वक यौन संबंध स्थापित कर सकता है, लेकिन मनुष्य इसके लिए तरस रहा है ! मनुष्य ने अपने हाथों से अपने पाँव में जंजीरें लगा ली हैं। इस बंधन की ऐसी भीषण प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य बलात्कारी हो गया ! आप गौर करेंगी कि पशु बलात्कार नहीं करता। मनुष्य सेक्स का क्रेता और विक्रेता हो गया ! वह सेक्स का व्यापार करने लगा ! जो हवा और पानी की तरह मुफ्त में सुलभ था, उसी की वह खरीद बिक्री करने लगा ! पशु ऐसा नहीं करता। मनुष्य अप्राकृतिक यौन संबंध का शिकार हो गया, पशु ऐसा नहीं होता। सेक्स के लिए न जाने मनुष्य कितने तरह से धोखे का जाल रचता है ! दहेज इस विवाह प्रथा का ही विषफल है, जिसके कारण न जाने कितनी स्त्रियाँ प्रतिदिन अपने प्राणों को गँवा रही हैं। पशुओं में कोई ऐसी प्रथा नहीं है। रास्ता यह था कि मनुष्य सेक्स को पशु की तरह सहज रूप में स्वीकार करता और धीरे-धीेरे उसे रूपांतरित कर ब्रह्मचर्य के आनंदलोक में प्रवेश करता। लेकिन इसे न समझ कर उसने दमित और जबरिया ब्रह्मचर्य को अपनाने की कोशिश की और रुग्ण हो गया !  इस रुग्णता से निकलने का रास्ता तो है हल्दोनी जी। लेकिन खोजने वाला चित्त कहाँ हैं ?
जिंदगी भर मनुष्य एक ही स्त्री या पुरुष से बँधा रहे, दूसरे से प्रेम न हो, यह मुझे अस्वाभाविक मालूम पड़ता है। हाँ, जो एक के साथ रहने में स्वाभाविक रूप से आनंदित हो और अन्य की चाहना न करे तो उसके लिए वह बिल्कुल ठीक है, वह उसी तरह रहे। लेकिन मन को मारकर एक को लेकर ही रहे, यह गलत है। और जो उस एक से ही निभाते रहने का फरमान जारी करे, वह दोगुना गलत है। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसी सलाह वही देते हैं जो खुद अपने मन को मारकर जी रहे होते हैं। अधिकांश लोगों के सोचने का ढंग गलत है। हम सबको एक ही टाइप का आदमी बनाना चाहते हैं। सबको एक ही टाइप में ढालना चाहते हैं, जबकि हर व्यक्ति का व्यक्तित्व अलग अलग होता है, उसकी जीवन शैली अलग होती है। हर व्यक्ति अपने ढंग से जीने में ही सुख शांति का अनुभव कर सकता है। जिस दिन मशीन टाइप के लोग मशीनीकरण से बाहर होकर अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को प्राप्त करेंगे उसी दिन जिंदगी से मुलाकात कर पायेंगे। प्रिया हल्दोनी टाइप के लोगों ने जीना सीखा कहाँ है और जब तक आदमी अपने जीवन को नहीं पा लेता तब तक वह अंदर से एक अभाव और बेचैनी महसूस करता है। इसी दुख और बेचैनी में वह किसी अन्य पुरुष से जा टकराता है-
आँख से छलका आँसू और जा टपका शराब में
मुझे लगता है कि इस सृष्टि में जड़ता और चेतनता के बीच निरंतर संघर्ष चल रहा है; दोनों के अपने गुरुत्वाकर्षण हैं। जड़ता अपनी तरफ खींचना चाहती है और चेतनता अपनी तरफ। जड़ता जड़ता की तरफ आकृष्ट हो जाती है और चेतनता चेतनता से जा मिलती है। जिसकी चेतना के सारे दरवाजे बंद हैं वे हल्दोनी के विचारों में कैद रहेंगे। जिनकी चेतना थोड़ी सी जगी है वे उससे निकल कर बाहर की हवा में साँस लेंगे। जड़ता दुख है, चेतनता आनंद है। मनुष्य की यही स्वतंत्रता है कि वह जिसे चाहे उसे चुन ले।
(मटुक नाथ पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं और अपनी शिष्या जूली से विवाहेत्तर संबंध रखने फिर उन्हीं के साथ रहने के कारण खासे चर्चित रहे हैं। कुछ लोग उन्हें स्वच्छंद प्रेम का मसीहा भी कहते हैं। यह लेख उन्होंने अपने फेसबुक पर लिखा है। वहीं से साभार लेकर प्रकाशित।)

रविवार, 4 सितंबर 2011

माँ से बड़कर कौन ?


शीर्षक माँ से बड़कर कौन ?
माँ की बेकदरी ना करना दोस्तों
माँ से बड़कर कौन ?
माँ ने हमको जन्म दिया है
माँ से बड़कर कौन ?
माँ ने हमको पाला पोसा बड़ा किया है
माँ की बेकदरी न करना दोस्तों
माँ से बड़कर कौन ?
माँ का आश्रीवाध जिसने पाया
दुनिया मैं उसने नाम कमाया
माँ जब खाती है तुम्हारी याद सताती है
माँ जब सोती है तुम्हारी याद सताती है
माँ जब रोती है तुम्हारी याद सताती है
माँ की बेकदरी न करना दोस्तों
माँ से बड़कर कौन ?
माँ मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे मैं जाती है
माँ पूजा भी तुम्हारे लिए करती है
माँ के दिल को न दुखाना मेरे दोस्तों
भगवान से बड़कर माँ का नाम है
भूल न जाना माँ के नाम को
माँ से बड़कर कौन ?
माँ के दूध के कर्ज को किसने चुकाया है
ये आजतक हमने दुनिया मैं नहीं पाया है
माँ के चरणों मै शीश झुकावो
माँ के गुण गान गाते जावो
माँ की हमेशा तुम्हारे लिए एक ही आश है
वो रास्ता तुम्हें मिल जायेगा जिसकी तुम्हें तलाश है
फूलों काँटों का दर्द माँ ने सहा है
इसको जानता है कौन
जब तक दुनिया मैं सूरज चांद रहेगा
तब तक एस दुनिया मैं माँ का नाम रहेगा

बुधवार, 10 अगस्त 2011

अगर भारत में होते दंगे तो डर कर भाग जाते अंग्रेज : सुनील गावस्कर

 इस समय लंदन समेत पूरा इंग्लैंड दंगो की आग में झुलस रहा है। बर्मिंघम में भी दंगों की गूंज सुनायी दे रही है। वहीं आज भारत को इंग्लैंड टीम के साथ टेस्ट मैच खेलना है। टीम इंडिया की सुरक्षा-व्यवस्था बढ़ा दी गयी है। लेकिन इसी बीच भारत के पूर्व कप्तान और बेहतरीन बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने एक बयान देकर सबको चौंका दिया है। गावस्कर ने कहा कि अगर भारत में दंगे होते और इंग्लैंड टीम यहां होती तो वो सीरीज बीच में छोड़कर भाग खड़े हुए होते। लेकिन हमारी टीम इंडिया ने बहादुरी का प्रदर्शन किया है जिसके लिए वो तारीफ की हकदार है।
गौरतलब है कि साल 2008 में मुंबई आतंकी हमलों के बाद इंग्लैण्ड के खिलाड़ी केविन पीटरसन सीरीज छोड़कर चले गए थे। हालांकि वो बाद में वापस आ गये थे। जहां सुनील गावस्कर टीम इंडिया को बहादुर साबित करने में जुटे है वहीं बीसीसीआई के ढुलमुल रवैये से भारतीय परेशान हैं। सबने कहा है कि बीसीसीआई को टीम को वापस बुला लेना चाहिए।

अमेरिकियों पढ़ो, नहीं तो चीन-भारत से पिछड़ जाओगे: ओबामा


वॉशिंगटन।। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देश की वर्तमान शिक्षा प्रणाली की खामियों को दूर करने की बात कही है। वह कहते हैं कि अमेरिकी बच्चों को भारत, चीन और ब्राजील से प्रतिस्पर्धा करने में हालिया शिक्षा प्रणाली मददगार नहीं है। उन्हें खूब पढ़ने की सलाह भी दी है। ओबामा को भारतीय बच्चों से इतना डर लग रहा है कि पिछले 2 महीने में कम से कम 3 बार वह यह बात कह चुके हैं। वॉशिंगटन में डेमोक्रेटिक पार्टी के एक समारोह को संबोधित करते हुए ओबामा ने कहा कि बाजार में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन इसके नीचे कुछ चुनौतियां काफी समय से बनी हुई हैं। हमारे सामने एक ऐसी शिक्षा प्रणाली है जिससे हमारे बच्चे पीछे हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर हम इसे दूर नहीं करते तो हम चीन या भारत या ब्राजील से मुकाबला नहीं कर पाएंगे, जिनमें इस विषय में काफी भूख है और जो यह समझते हैं कि जिस देश के पास बेहतर और दक्ष मानव संसाधन होगा, वह देश आर्थिक रूप से सफल होगा। ओबामा ने कहा कि उनके प्रशासन की ओर से उठाए गए कदमों के कारण पिछले 17 महीने में प्राइवेट सेक्टर में रोजगार बढ़ा है। 

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

..देखता ही तो हूँ …. →सूखा पानी


]उसकी  गैर  से  मुलाकात  हुई  थी ,
सात फेरो की करामात हुई थी,
खुदा खुद रोया सुबक सुबक के,
सबूत है दोस्तों, उस रात बरसात हुई थी.

उसकी आँख को फड़कते देखा था यारो
मुझसे पल्लू तक झटकते देखा था यारो,
गैर की बाह समंदर सी थी चाहे उसके लिए,
पर बिन पानी मछली सा तड़पते देखा था यारो

कच्ची कच्ची ईटो का पक्का घरोंदा बनाते है चल
अरमान पाल के एक दिल में, समंदर में उतर जाते है चल,
मानता हूँ लहरे मुझे भिगो देंगी जरूर
पर एक शौक ऐसा दिल में सजाते है चल

जब जब हमने प्यार किया था,
एक राज एक एक सार लिया था,
हुआ होगा तुम्हे व्यापार में घाटा,
हमने घाटे का व्यापार किया था

आज रात मुझे सोने ना दिया
दाग भी दामन का धोने ना दिया,
कंधे तो जरूर दिए उस बेवफा ने मुझे
पर रोना चाहा तो रोने ना दिया .

दर्द कम करने की दवाई बनाता हूँ,
अपनी कविता की घुट्टी पिलाता हूँ,
यकीं ना हो तो उस बेवफा से पूछिए
मै किस तरह मुर्दे जिलाता हूँ

सोमवार, 8 अगस्त 2011

अन्तिम क्षण का गीत

कभी-कभी
मैं तुम्हें याद करती हूँ
इसलिए नहीं
कि भाग्य तुम्हारे से सम्मोहित मैं हूँ
बल्कि इसलिए
नहीं मिटा पाई हूँ अब तक
छाप आत्मा से मैं अपनी
छोड़ गया है
जो छोटा-सा मिलन हमारा

गुज़रा करती जान-बूझकर
लाल मकां के पास तुम्हारे
बना हुआ है जो गंदली-सी नदी किनारे
मुझे पता है निर्दयता से
धूप-सनी नीरवता प्रिय की
भंग किया करती हूँ

नहीं भले ही हो अब तुम वह
जिसने मेरी इच्छाओंको
अमर किया स्वर्णिम गीतों में
जब शामें होती हैं गीली
और दुबारा मिलन हमेरा
हो उठता है बहुत ज़रूरी
(किन्तु करूँ क्या)
जब निषिद्ध यह
मैं भविष्य पर गुप्त रूप से
मोहन-मंत्र चलाती हूँ
आन्ना अख़्मातवा
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बहुत बेबस था मन मेरा
पर चाल थी मेरी हल्की
मैं दस्ताना बदल रही थी
घबराहट थी कल की
मुझे लगा- सीढ़ियाँ हैं ज़्यादा
पर सीढ़ी थीं केवल तीन
उधर फुसफुसा रहा था पतझड़
आ, आजा! मौत है हसीन!
मैं चली थी धोखा देने
अपने दुखी, अशांत जीवन को
कहा- तेरे साथ मरूँगी
वारा तुझ पर तन-मन को
यह गीत था अन्तिम क्षण का
देखा मैंने उस घर को
वहाँ शयनकक्ष था रोशन
उस फीके पीले निर्झर को
अन्तिम क्षण का गीत
.......................

नर हो न निराश करो मन को


कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रह के निज नाम करो।
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो!
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को।
सँभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला!
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना।
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को।।
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ!
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठ के अमरत्व विधान करो।
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को।।
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे।
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को।।
प्रतिशोध
किसी जन ने किसी से क्लेश पाया
नबी के पास वह अभियोग लाया।
मुझे आज्ञा मिले प्रतिशोध लूँ मैं।
नही निःशक्त वा निर्बोध हूँ मैं।
उन्होंने शांत कर उसको कहा यों
स्वजन मेरे न आतुर हो अहा यों।
चले भी तो कहाँ तुम वैर लेने
स्वयं भी घात पाकर घात देने
क्षमा कर दो उसे मैं तो कहूँगा
तुम्हारे शील का साक्षी रहूँगा
दिखावो बंधु क्रम विक्रम नया तुम
यहाँ देकर वहाँ पाओ दया तुम।

शनिवार, 6 अगस्त 2011

महाकवि श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर की ’निरुद्देश यात्रा’ से

महाकवि श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर

मैं अपने से अनजानों को कुछ पंक्तियाँ लिखता हूँ ;
तुम इनको पढकर, मुझसे कुछ सा कुछ कुछ समझा देना ,
कुछ यहाँ का, कुछ वहाँ का, ले दे सा बिखरा दिखता हूँ;
तुम एक एक कर मुझसे मुझको निखरा सा सुलझा देना,
हे प्रिय तुमसे आशा है, शब्दों की सिमित भाषा है;
मुझसे अनजान बने रहना, पर मेरी जान बने रहना
न तुमसे कभी मिलना हो,न सुलगन हो न बिलखना हो
बस इसी अनजाने पन से तुम मुझको सब समझा देना

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’अभी और है कितनी दूर तुम्हारा प्यारा देश?’--
कभी पूछता हूँ तो तुम हँसती हो
प्रिय, सँभालती हुई कपोलों पर के कुंचित केश!
मुझे चढ़ाया बाँह पकड़ अपनी सुन्दर नौका पर,
फिर समझ न पाया, मधुर सुनाया कैसा वह संगीत
सहज-कमनीय-कण्ठ से गाकर!

मिलन-मुखर उस सोने के संगीत राज्य में
मैं विहार करता था,--
मेरा जीवन-श्रम हरता था;

मीठी थपकी क्षुब्ध हृदय में तान-तरंग लगाती
मुझे गोद पर ललित कल्पना की वह कभी झुलाती,
कभी जगाती;

जगकर पूछा, कहो कहाँ मैं आया?
हँसते हुए दूसरा ही गाना तब तुमने गाया!
भला बताओ क्यों केवल हँसती हो?--
क्यों गाती हो?
धीरे धीरे किस विदेश की ओर लिये जाती हो?
(२)
झाँका खिड़की खोल तुम्हारी छोटी सी नौका पर,
व्याकुल थीं निस्सीम सिन्धु की ताल-तरंगें
गीत तुम्हारा सुनकर;
विकल हॄदय यह हुआ और जब पूछा मैंने
पकड़ तुम्हारे स्त्रस्त वस्त्र का छोर,
मौन इशारा किया उठा कर उँगली तुमने
धँसते पश्चिम सान्ध्य गगन में पीत तपन की ओर।
क्या वही तुम्हारा देश
उर्मि-मुखर इस सागर के उस पार--
कनक-किरण से छाया अस्तांचल का पश्चिम द्वार?
बताओ--वही?--जहाँ सागर के उस श्मशान में
आदिकाल से लेकर प्रतिदिवसावसान में
जलती प्रखर दिवाकर की वह एक चिता है,
और उधर फिर क्या है?
झुलसाता जल तरल अनल,
गलकर गिरता सा अम्बरतल,
है प्लावित कर जग को असीम रोदन लहराता;
खड़ी दिग्वधू, नयनों में दुख की है गाथा;
प्रबल वायु भरती है एक अधीर श्वास,
है करता अनय प्रलय का सा भर जलोच्छ्वास,
यह चारों ओर घोर संशयमय क्या होता है?
क्यों सारा संसार आज इतना रोता है?
जहाँ हो गया इस रोदन का शेष,
क्यों सखि, क्या है वहीं तुम्हारा देश?++

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम

बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
खि़ड़कियाँ हों हर तरफ़ ऐसी दुआ लिखते हैं हम
आदमी को आदमी से दूर जिसने कर दिया
ऐसी साज़िश के लिये हर बद्दुआ लिखते हैं हम
जो बिछाई जा रही हैं ज़िन्दगी की राह में
उन सुरंगों से निकलता रास्ता लिखते हैं हम
आपने बाँटे हैं जो भी रौशनी के नाम पर
उन अँधेरों को कुचलता रास्ता लिखते हैं हम
ला सके सब को बराबर मंज़िलों की राह पर
हर क़दम पर एक ऐसा क़ाफ़िला लिखते हैं हम
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हम भी हुए दीवाने आखिर दीवानों की बस्ती में

कोई अपना ढूँढने निकला हमें बेगानों की बस्ती में

चेहरे पर एक चहरा लगाकर हर पल सौ सौ रंग भरे

हम खो बैठे अपनी हकीकत अफसानो की बस्ती में ||
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..क्या करूँ.

.मन बुद्धि और विवेक का संघर्ष जाने और
क्या-क्या दिखलाएगा..माटी का पुतला जाने कब तक थपेडों को सह पायेगा..कहने
को तो सभी अच्छा बोल लेते है पर विजेता तो वही है जो कर पाया है
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स्वर्ण हूँ तो क्या हुआ तपना पडेगा, हार बनाना हो तो फ़िर गलना पडेगा ।
जिन्दगी तो हर घडी लेगी परीक्षा, जो न दे उस को यहाँ पिटना पडेगा ॥
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"सीडीयाँ उन के लिये बनी हैं, जिन्हे सिर्फ़ छत पर जाना है।
आसमाँ पर हो जिनकी नजर, उन्हें तो रास्ता खुद बनाना है” ॥
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मैं दो कदम चलता और एक पल को रुकता मगर
इस एक पल जिन्दगी मुझसे चार कदम आगे बढ जाती।
मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रुकता और
जिन्दगी फिर मुझसे चार कदम आगे बढ जाती।
युँ ही जिन्दगी को जीतता देख मैं मुस्कुराता और
जिन्दगी मेरी मुस्कुराहट पर हैंरान होती।
ये सिलसिला यहीं चलता रहता..
फिर एक दिन मुझे हंसता देख एक सितारे ने पुछा
" तुम हार कर भी मुस्कुराते हो! क्या तुम्हें दुख नहीं होता हार का? "
तब मैंनें कहा
मुझे पता हैं एक ऐसी सरहद आयेगी जहाँ से आगे
जिन्दगी चार कदम तो क्या एक कदम भी आगे ना बढ पायेगी,
तब जिन्दगी मेरा इन्तज़ार करेगी और मैं..
तब भी युँ ही चलता रुकता अपनी रफ्तार से अपनी धुन मैं वहाँ पहुँगा
एक पल रुक कर, जिन्दगी को देख कर मुस्कुराउगा
बीते सफर को एक नज़र देख अपने कदम फिर बढाँउगा।
ठीक उसी पल मैं जिन्दगी से जीत जाउगा
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आज एक बार फ़िर सुरज को उगता देखो
और चान्द को चान्दनी रात मे जागता देखो
क्या पता कल ये धरती
चान्द और सुरज हो ना हो
आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो
आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो
आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो
बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो
आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो
आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो
क्या पता
कल हो ना हो .... 
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"ज़िन्दगी की जंग में जाँबाज़ होना आ गया
मौत को तकिए के नीचे रख के सोना आ
गया
ज़िन्दगी तेरे मदरसे में यही सीखा हुनर
मोम के धागे में अंगारे
पिरोना आ गया
इस क़दर खुश था मेरी काग़ज़ की कश्ती देखकर
हाथ में जैसे
समन्दर के खिलौना आ गया
और तो होना था क्या इन मुश्किलों में दोस्तो!
पीठ
पर चट्टान जैसा बोझ ढोना आ गया
बाद मुद्दत के गया था आज मैं भाई के
घर
उसकी आँखें नम हुईं मुझको भी रोना आ गया
सिसकती रुत को महकता गुलाब कर
दूँगा
मैं इस बहार में सब का हिसाब कर दूँगा
मैं इंतज़ार में हूँ तू कोई
सवाल तो कर
यकीन रख मैं तुझे लाजवाब कर दूँगा
हज़ार पर्दों में खुद को
छुपा के बैठ मगर
तुझे कभी न कभी बेनकाब कर दूँगा
मुझे यकीन है की महफ़िल
की रौशनी हूँ मैं
उन्हें ये खौफ के महफ़िल ख़राब कर दूँगा
मुझे गिलास के
अन्दर ही क़ैद रख वरना
मैं सारे शहर का पानी शराब कर दूँगा
महाजनों से कहो
थोडा इंतज़ार करें
शराब खाने से आकर हिसाब कर दूँगा"
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अपने
हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।
मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको।
ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।
बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ ‘क़तील’
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।

कल थे,,आज नहीं हैं

जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।
होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।
सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।
किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
यह प्रश्न अनुत्तरित है।
प्रत्येक नया नचिकेता,
इस प्रश्न की खोज में लगा है।
सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।
शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
तो इसमें बुराई क्या है?
 
चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥  
 
हम अगर आप से मिल नही पाते..
ऐसा नही की आप हमें याद नही आते..
माना की सब रिश्ते निभाऐ नही जाते
मगर जो दोस्त दिल मे बस जाते है...

... वो कभी भुलाऐ नही जाते. 
 
कुछ ऐसी हमारी किस्मत हो, पीता भी रहूं और प्यास भी हो
मस्ती में बहकता दिल भी रहे और होश भरा उल्लास भी हो
मिट जाएं मेरी हस्ती के निशां, मौजूद भी लेकिन पूरा रहूं
मैं उसका नजारा देखा करूं, संसार भी हो संन्यास भी हो
जीवन का सफर यों बीते अगर, कुछ धूप भी हो, कुछ छांव भी हो
मिलता भी रहे चलने का मजा, मंजिल का सदा अहसास भी हो
पर्दे में छुपा हो लाख मगर, जलवा भी दिखाई देता रहे
इस आंख मिचौनी खेल में वो, कुछ दूर भी हो, कुछ पास भी हो
कुछ इश्के-खुदा में चुप भी रहूं, कुछ इश्के-बुतां में बात भी हो
धरती भी बसी आंखों में रहे, प्यारा ये खुला आकाश भी हो
हो चुप्पी मगर कुछ गाती हुई, संगीत हो मौन में डूबा हुआ
रोदन भी चले कुछ मुस्काता, कुछ अश्रु बहाता हास भी हो
सन्नाटा कभी तूफान सा हो, चुपचाप सी गुजरे आंधी कभी
मझधार भी हो साहिल की तरह, पतवार भी हो, विश्वास भी हो
मुमकिन हो अगर यह दुनिया में, जीने का मजा कुछ और ही हो
मौला भी रहे, बंदा भी रहे, गीता भी झरे और व्यास भी हो
कुछ ऐसी हमारी किस्मत हो, पीता भी रहूं और प्यास भी हो
मस्ती में बहकता दिल भी रहे और होश भरा उल्लास भी हो
मिट जाएं मेरी हस्ती के निशां, मौजूद भी लेकिन पूरा रहूं
मैं उसका नजारा देखा करूं, संसार भी हो संन्यास भी हो

कुछ अन्दर कि आवाज़ से लिखता रहता हूँ
एक खिलते फूल को बिखरते हुए देखा
बंद मुट्ठी से रेत को सरकते देखा
क्या सचमुच जी रहे है हम जिन्दगी
या सिर्फ वक़्त को गुजरते देखा ......

माना तू भी अजनबी मैं भी अजनबी इस में डरने की क्या बात है जरा मुस्कुरा तो दे
प्रेम मार्ग
प्रेम मार्ग मस्त रहने की भी कोई हद होती है ,सोचता हूँ,
कभी जीवन है धूप
कभी पीपल की छावं
कभी जीवन है झरना
कभी कौवे की कावं-कावं //
कभी निराशा की गली में
थकता है तन-मन
कभी आशा की रोड पर
थकते नहीं हैं पावं // 
मुझको आना पड़ा.
मन नहीं था मगर मुझको आना पड़ा
दिल वहीँ था मगर मुझको आना पड़ा
वो  घडी  दो   घडी   में   पिघल   जाएंगे
ये यकीं था मगर मुझको आना पड़ा
 
दर्द....
दिल में कुछ दर्द सा जगा शायद
उसने मांगी है फिर दुआ शायद
फिर घुली चांदनी में खुशबू सी
चाँद ने फिर उसे छुआ शायद
 
खिलखिलाता कौन है....

धडकनों  में  साज़  है  लेकिन  सजाता  कौन  है
प्यार  के  नगमे  बहुत  हैं  गुनगुनाता  कौन  है
इस कदर हम दब चुके हैं जिंदगी के बोझ से
होंठ अब खुलते कहाँ हैं, खिलखिलाता कौन है
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---- दिल को चुरा कर चले गए..
देखा   हमे  तो  नज़रे  झुका  कर  चले गए
तीर-ए-नज़र को दिल पे चला कर चले गए
हम  रह  गए   ठगे  से   खड़े   देखते   रहे
वो एक पल में दिल  को  चुरा कर चले गए
 
सिर्फ दो कदम दूर किनारा होगा, सोचो कितना खुबसूरत नजारा होगा. .बस दिल जो कहे उसे करना, फिर देखना..जिसे तुम सोचोगे वो तुम्हारा होगा.. 
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multinational compney

एक कम्पनी आयी. कहा, नमक, कोयला आदि खुरदुरे होते हैं और दांतों को खराब कर देते हैं. हमारा पाउडर मुलायम है, सुरक्षित है. अब कहते हैं हमारा टूथपेस्ट अच्छा है क्योंकि इसमें नमक है.. फिर कहा कि दातुन उबड-खाबड़ होती है. हमारा ब्रश समतल है और दांतों की सफाई समान रूप से करता है... अब कहते हैं कि हमारा ब्रश ज़िग-ज़ैग है इसलिए दांतों के बीच भी ठीक से सफाई करता है.. फिर कहा कि हमारा ब्रश लचीला है, कोने-कोने तक जाता है. अँगुली से ज्यादा लचीला है क्या? एक व्यक्ति को कितने तरीके से और कितनी बार मूर्ख बनाया जा सकता है, इन विदेशी कंपनियों से सीखिए. और हर बार कैसे तत्परता से मूर्ख बना जाता है, भारतीयों से सीखीये. क्या आपके खाने में आयोडाइज्ड नमक है? है तो भाई मूर्खता छोड़ो और दिमाग चलाओ. सुंदर, स्वस्थ और चमकदार दांतों के लिये चौथाई चम्मच नमक में कुछ बूँद सरसों का तेल डालकर अँगुली से दाँत साफ़ कीजिये.....
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!!! जीवन सफल बनाना है तो, सत्य पथ अपनाना होगा॥!
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हार न जाना काल चक्र से, जीत को शीश झुकाना होगा।
जीवन सफल बनाना है तो, सत्य पथ अपनाना होगा॥
द्विधा की घनघोर घटा जब, मन मानस पर घिरती जाए।
मोह, भ्रान्ति के अवरोधों से, प्रेम की धारा रूकती जाए।।
ज्ञान, विवेक, सुमति, साहस से, संशय तुम्हे मिटाना होगा।
जीवन सफल बनाना है तो, सत्यपथ अपनाना होगा॥
संसार-सिन्धु की लहरों से, जीवन नौका टकराएगी।
प्रचंड काल की भंवरों में, यह कभी उलझ जायेगी॥
निर्भय निर्द्वंद दृढ़ता से, तुमको पतवार चलाना होगा।
जीवन सफल बनाना है तो, सत्य पथ अपनाना होगा॥
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मनुष्य का मन तो संकल्प-विकल्प दोनों करता है। उसमें परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न
होते रहते हैं। अच्छे विचार आते हैं तो बुरे विचार भी आते हैं। बुरे विचार आते हैं
तो उसके विरोधी विचार अर्थात अच्छे विचार भी अवश्य उत्पन्न होते हैं। मन में उठने
वाले विचारों पर नियंत्रण कर हम जीवन को मनचाहा आकार दे सकते हैं। जैसा भाव या
विचार, वैसा ही जीवन। हमारी आंतरिक और बाह्य सृष्टि हमारे ही भावों से आकार पाती है
और उसी से नियंत्रित होती है। सकारात्मक भावों द्वारा इसे सही आकार प्रदान किया जा
सकता है !
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मैं उंगलियों पर गिनी जा सकें, इतनी बातें कहता हूं:
1. मन को जानना है, जो इतना निकट है, फिर भी इतना अज्ञात है।
2. मन को बदलना है, जो इतना हठी है, पर परिवर्तित होने को इतना आतुर है।
3. मन को मुक्त करना है, जो पूरा बंधन में है, किंतु 'अभी और यहीं' मुक्त हो सकता है।
ये
तीन बातें भी कहने की हैं, करना तो केवल एक ही काम है। वह है : मन को
जानना। शेष दो उस एक के होने पर अपने आप हो जाती हैं। ज्ञान ही बदलाहट है,
ज्ञान ही मुक्ति है।


कोकिल जितना घायल होता

उतनी मधुर कुहुक देता है
जितना धुंधवाता है चंदन
उतनी अधिक महक देता है
मैं तो केवल तन ही तन था मुझमें जागे मन के पहले
जैसे सिर्फ बांस का टुकड़ा है बंसी-वादन के पहले
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!! कोई भी काम एक दिन में नहीं सफल होता। काम एक पेड़ की तरह होता है। पहले उसकी आत्मा में एक बीज बोया जाता है, हिम्मत की खाद से उसे पोषित किया जाता है और मेहनत के पानी से उसे सींचा जाता है, तब जाकर सालों बाद वह फल देने के लायक होता है। सफलता के लिए इन्तजार करना आना चाहिए। पौधे से फल की इच्छा रखना मूर्खता से अधिक कुछ भी नही है।असफलता सफलता प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अपने मस्तिष्क को अपना रास्ता स्वयं खोजने की शक्ति दीजिये।!
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!! मेरे इन्टरनेट दोस्तों से अनुरोध !!
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मुझे तो आदत है आपको याद करने की
अगर हिचकी आए तो माफ़ करना .
ये दुनियाँ वाले भी बड़े अजीब होते हैं
कभी दूर तो कभी करीब होते हैं
दर्द न बताओ तो हमें कायर कहते हैं
और दर्द बताओ तो हमें शायर कहते हैं
एक मुलाकात करो हमसे इनायत समझकर
हर चीज़ का हिसाब देंगे कयामत समझकर
मेरी दोस्ती पर कभी शक न करना
हम दोस्ती भी करते हैं इबादत समझकर।


" हमसे जुड़े कई दोस्त ऐसे हैं जिनसे कोई प्रतिक्रिया, कोई सन्देश या कोई स्क्रेप बिलकुल नहीं आते. ..यदि ऐसा है तो दोस्ती का उद्देश्य अधूरा है. ..इतना तो करना ही चाहिए कि माह में कम से कम एक-दो सन्देश आना ही चाहिए.. अन्यथा आपके मनोभावों से हम अनजान ही बने रहेंगे और यहाँ से प्रेषित किये जा रहे संदेशों को पसंद न आने
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समय की राह

जीवन की गाड़ी में विनम्रता का ग्रीस लगाए बड़ी आराम से चलेगी.
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ह्रिदय से निर्णय लेनेवाले दिखावटी सत्य को महत्व नही देते, और जो बुद्धी से निर्णय लेते हैं, वो दिखावटी सत्य को सत्य मनते है चुनाव करते समय हमे दोनोकी सहायता लेनी होगी. बात ना बने तो समय की राह देखना ही समझदारी है.
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दुनिया में दो तरह के लोग होते है एक वो जो मिली हुई ज़िन्दगी के साथ चलते है.और एक दिन खत्म हो जाते है..वहीं दूसरी ओर कम ऐसे लोग होते है जो अपनी ज़िन्दगी को आकार देते है उसे बदलते है और उसे जी भरकर जीते है...

बुधवार, 6 जुलाई 2011

मैं आम आदमी हूँ

...
मै खरीद के आम ला नहीं सकता, शक्कर इतनी महंगी कि ख़ुशी में भी मीठा मँगा नहीं सकता।
मै भूखा रह नहीं सकता, और इस महंगाई में पेट भर खा नहीं सकता
अब तो बिना चेकिंग कराये में भगवान के दर भी जा नहीं सकता,
आरक्षण का डंक ऐसा कि, कितना भी पढ़ लूँ मैं अव्वल आ नहीं सकता।
घुटनों में रहता है दर्द हमेशा, पर मैं महंगे पेट्रोल का खर्चा भी उठा नहीं सकता
सपने रोज बुनता हूँ आशियाना बनाने के, लेकिन बढती ब्याज दरें, अब EMI चुका नहीं सकता।
मैं आम आदमी हूँ ...
किसी को भी सरताज बना सकता हूँ? मैं आम को खास बना सकता हूँ ,
लेकिन फिर उस खास तक अपनी आवाज़ पंहुचा नहीं सकता ...
मुझे क़दमों तले रख के ही सभी आगे बढ़ जाते है...
कभी मुझे 'being human' तो कभी 'india against corruption' दिखाते है
मै नहीं जानता लोकपाल, न ही काला धन देखा है कभी,
फिर भी उनके सुर में ताल मिलाता हूँ, क्यूंकि "बड़ा" कभी गलत बात सीखा नहीं सकता।

मैं आम आदमी हूँ ....
में भीड़ में खो रहा हूँ, आजाद होने का सारा क़र्ज़ टूटे कंधों पे ढो रहा हूँ
रोज पानी पीने के लिए कुआँ मै खोद नहीं सकता ...
मुस्कराते है मुझे देख के लोग, खुल के इसलिए रो नहीं सकता...

मैं आम आदमी हूँ ....
मुझ से मिलना जो चाहो तुम तो चले आना मै मिलूँगा तुम्हे ....

कभी फूटपाथ पे किसी बड़ी गाडी के निचे,तो कभी भीड़ में सफ़ेद कपडे के पीछे
कभी रामलीला में मार खाते हुए तो कभी सरकारी दफ्तरों में चक्कर लगाते हुए
कभी मिलूँगा प्रशासन से डरता हुआ, तो कभी भूख से बिलख बिलख के मरता हुआ
कभी किसी साधू के पीछे तो कभी किसी नेता के पीछे
अक्सर मिल जाऊंगा तुम्हे किसी बड़ी ईमारत कि नींव के नीचे.

कभी अनशन में तो कभी भाषण में, कभी भिखारी कि तरह खड़ा राशन में।
कभी किसी कवि कि लेखनी में "दरिद्र", तो कभी बना "राजा" कहानी किस्सों में
कभी मिलूँगा पेड़ पे लटका सीधा, तो कभी बम से बँटा हिस्सों हिस्सों में
कभी मिल जाऊँगा खाली जेब टटोलते हुए, कभी खाली डब्बों को बार बार खोलते हुए।
मिल जाऊँगा बसों ट्रेनों कि छत के ऊपर, किसी बेरंग पुराने ख़त के उपर
कभी देश के "दुश्मनों" कि "गोली" खाते हुए, कभी देश के "सिपहसलारों" कि "गाली" खाते हुए।
आज कल जरा फ़ालतू हूँ मिल जाऊँगा हर नुक्कड़ पे काले धन, भ्रष्टचार पे बतियाते हुए।
मैं आम आदमी हूँ, मुझे चाह के भी कोई मंजिल दिला नहीं सकता,
मेरा जन्म हुआ है दुःख भोगने के लिये, कोई मुझे मेरे सपनों से मिला नहीं सकता।